मनरेगा खत्म? अब आएगी 'जी-राम-जी' योजना: ग्रामीण भारत के लिए 5 सबसे चौंकाने वाले बदलाव जो आपको जानने चाहिए

Author
Kamal Bansal December 21, 2025
137
Featured

मनरेगा खत्म? अब आएगी 'जी-राम-जी' योजना: ग्रामीण भारत के लिए 5 सबसे चौंकाने वाले बदलाव जो आपको जानने चाहिए


नमस्ते, ग्रामीण भारत की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले मनरेगा कानून में एक बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सरकार मनरेगा को खत्म कर एक नई योजना 'जी-राम-जी' (VB-GRAM G) लाने की तैयारी में है। यह बदलाव आपके हक, आपकी मजदूरी और आपके गांव के विकास को कैसे प्रभावित करेगा, इसे विस्तार से समझना जरूरी है।

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के एक छोटे से गांव में शाम के धुंधलके में रामू अपने पुराने मनरेगा जॉब कार्ड को देख रहा है। पिछले बीस सालों से इसी कार्ड ने उसके घर में भूख और इज्जत के बीच की लकीर खींची है। जब भी खेतों में काम नहीं होता था, रामू पंचायत जाकर काम मांगता था और 15 दिन में उसे काम मिल जाता था। यह उसका कानूनी हक था। लेकिन आज गांव के चौपाल पर चर्चा है कि अब सरकार काम तभी देगी जब उसके पास पैसा (बजट) होगा। रामू परेशान है कि अगर बजट खत्म हो गया, तो क्या उसके बच्चे भूखे सोएंगे? क्या उसका यह 'हक' अब केवल एक सरकारी योजना बनकर रह जाएगा? यह कहानी सिर्फ रामू की नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की है जो इस बदलाव के मुहाने पर खड़े हैं।

Website Home Page: Rojgar4u.com

Rojgar4u Jobs Digest: click here - https://rojgar4u.com/resources/views/digest/

Sponsored Advertisement

Rojgar4u Daily News: click here - https://rojgar4u.com/resources/views/digest/News.php

Rojgar4u Career and Success Blog: click here - https://rojgar4u.com/resources/views/blogs/index.php

Rojgar4u Current Affairs : click here - https://rojgar4u.com/resources/views/digest/Current_Affairs.php

विषय सूची (Index)

  1. मनरेगा का इतिहास और इसकी विरासत

  2. क्या है नया वीबी-ग्राम जी (VB-GRAM G) बिल?

    Sponsored Advertisement
  3. मांग-आधारित से सप्लाई-आधारित: क्या काम का अधिकार अब गारंटी नहीं?

  4. 125 दिन का रोजगार और 60 दिनों की अनिवार्य छुट्टी का सच

  5. राज्यों पर खर्च का भारी बोझ: क्या पिछड़ जाएंगे गरीब प्रदेश?

  6. टेक्नोलॉजी का डबल-गेम: पारदर्शिता या गरीबों का बहिष्कार?

  7. सिर्फ गड्ढे खोदना नहीं, 'विकसित भारत' के लिए संपत्ति निर्माण

    Sponsored Advertisement
  8. बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी? सरकार का तर्क

  9. मनरेगा बनाम वीबी-ग्राम जी: एक तुलनात्मक विश्लेषण

  10. निष्कर्ष: ग्रामीण भारत का भविष्य और नीतिगत चुनौतियां



    Sponsored Advertisement



1. मनरेगा का इतिहास और इसकी विरासत

पिछले 20 सालों से, भारत के ग्रामीण इलाकों में एक कानून सिर्फ रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि भूख और इज्जत का फर्क तय करता आया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने करोड़ों परिवारों को एक कानूनी सुरक्षा कवच दिया। लगभग दो दशकों से, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक जीवनरेखा रहा है। 2005 में लागू हुआ यह कानून केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक अधिकार-आधारित सामाजिक सुरक्षा कवच था, जो ग्रामीण परिवारों को हर साल 100 दिनों के काम की कानूनी गारंटी देता था। मनरेगा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि यह एक 'मांग-संचालित' (Demand-Driven) कार्यक्रम था। यह सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि एक कानूनी अधिकार था। इसका मतलब यह था कि सरकार काम बनाने के बाद लोगों को नहीं बुलाती थी, बल्कि ग्रामीण नागरिक स्वयं काम की मांग करते थे और सरकार उन्हें काम देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य थी।


2. क्या है नया वीबी-ग्राम जी (VB-GRAM G) बिल?

अब, इस 20 साल पुराने कानून को एक नए बिल से बदला जा रहा है, जिसका नाम है - विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण (VB-G RAM G) बिल। यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं है। यह ग्रामीण रोजगार के दर्शन को मौलिक रूप से बदलने का एक प्रयास है—एक अधिकार-आधारित सुरक्षा जाल से एक विकास-केंद्रित संपत्ति निर्माण ढांचे की ओर। इस ऐतिहासिक कानून को 'विकसित भारत ग्रामीण रोजगार एंड आजीविका मिशन' (VB-GRAM G) नामक एक नए बिल द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है। यह बदलाव महज़ एक तकनीकी अद्यतन नहीं है, बल्कि शासन के दर्शन में एक गहरा वैचारिक परिवर्तन है। यह हमें एक मौलिक प्रश्न की ओर ले जाता है: सरकार इस परिवर्तन के माध्यम से अधिकार-आधारित सामाजिक सुरक्षा से संपत्ति-उन्मुख आर्थिक विकास के मॉडल की ओर क्यों बढ़ रही है, और ग्रामीण श्रमिकों के लिए इसके क्या मायने हैं?

Sponsored Advertisement



3. मांग-आधारित से सप्लाई-आधारित: क्या काम का अधिकार अब गारंटी नहीं?

मनरेगा का सबसे बड़ा आधार यह था कि यह एक "मांग-आधारित" (demand-driven) योजना थी। इसका मतलब था कि ग्रामीण नागरिक काम की मांग कर सकते थे और सरकार 15 दिनों के भीतर काम देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य थी। ऐसा न कर पाने पर बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता था। यह एक कानूनी अधिकार था। इसके विपरीत, नया VB-GRAM G बिल "सप्लाई-आधारित" (supply-driven) है। इसका मतलब है कि अब केंद्र सरकार राज्यों के लिए एक वार्षिक बजट आवंटन ("नॉर्मेटिव एलोकेशन") तय करेगी। अगर किसी राज्य के लिए आवंटित फंड खत्म हो जाता है, तो उस अवधि के लिए रोजगार का अधिकार भी समाप्त हो जाएगा। एक तरीके से कैप्ट फ्लोस यहां पर कर दिए गए हैं कि जब आपके फंड्स खत्म हो गए तो भैया एंप्लॉयमेंट का राइट भी वहां पर खत्म हो गया तो वेरी वेरी इम्पोर्टेंट पॉइंट जिसकी वजह से स्कीम को क्रिटिसाइज भी यहां पर किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि एंप्लॉयमेंट की राशनिंग यहां पर हो रही है। कंप्लीट ली सप्लाई ड्रिवन इसे यहां पर बनाया जा रहा है। विश्लेषकों का तर्क है कि यह सबसे fondamental बदलाव है। यह काम के कानूनी अधिकार को एक बजटीय लाभ में बदल देता है, जिससे प्रभावी रूप से "रोजगार की राशनिंग" होती है, जहाँ फंड खत्म होते ही अधिकार भी खत्म हो जाता है।



4. 125 दिन का रोजगार और 60 दिनों की अनिवार्य छुट्टी का सच

नए बिल में एक सकारात्मक बदलाव यह है कि गारंटीशुदा काम के दिनों को प्रति वित्तीय वर्ष 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव है। लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच है। यह बिल राज्यों को 60 दिनों तक का "सीजनल पॉज" (मौसमी रोक) लागू करने की अनुमति देता है। सरकार का तर्क है कि यह कदम बुवाई और कटाई जैसे कृषि के चरम मौसमों के दौरान खेतों में मजदूरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए है। हालांकि, इस प्रावधान का गहरा कानूनी प्रभाव है। इन 60 दिनों के दौरान, सरकार की रोजगार प्रदान करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं रहेगी ("सरकार की ऑब्लिगेशन नहीं रहेगी आपको एंप्लॉयमेंट प्रोवाइड करने की")। जमीनी हकीकत भी हर जगह एक जैसी नहीं है; उत्तर प्रदेश के अयोध्या और सुल्तानपुर जैसे जिलों में पीक सीजन में भी मजदूरों की मांग बनी रहती है। यह "सीजनल पॉज" भले ही कुछ किसानों की मदद करे, लेकिन यह मजदूरों की मोलभाव करने की शक्ति को कम कर सकता है और ठीक उस समय रोजगार का सुरक्षा कवच हटा सकता है जब कुछ क्षेत्रों में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो।

Sponsored Advertisement



5. राज्यों पर खर्च का भारी बोझ: क्या पिछड़ जाएंगे गरीब प्रदेश?

मनरेगा के तहत, अकुशल मजदूरी का 100% खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी। इससे गरीब राज्यों पर वित्तीय जोखिम न्यूनतम था। अब, VB-GRAM G बिल इसे एक "केंद्र प्रायोजित योजना" (Centrally Sponsored Scheme) के रूप में पुनर्परिभाषित करता है, जिसमें लागत-साझाकरण मॉडल है: अधिकांश राज्यों के लिए 60:40 और पूर्वोत्तर/हिमालयी राज्यों के लिए 90:10। इसका मतलब है कि यह योजना अब केंद्र और राज्यों की एक साझा वित्तीय जिम्मेदारी है। अनुमान है कि इससे राज्यों पर 300 से 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। यह बदलाव क्षेत्रीय असमानताओं को बढ़ा सकता है। जो राज्य पहले से ही कर्ज के दबाव में हैं, विशेषकर गरीब राज्य, उन पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा। यदि किसी गरीब राज्य को केंद्र से कम आवंटन मिलता है और वह अपना हिस्सा देने में असमर्थ होता है, तो वहां ग्रामीण रोजगार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।


Sponsored Advertisement

6. टेक्नोलॉजी का डबल-गेम: पारदर्शिता या गरीबों का बहिष्कार?

नया बिल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी के एकीकरण पर बहुत जोर देता है। इसमें एआई धोखाधड़ी का पता लगाना, जीपीएस और मोबाइल मॉनिटरिंग, बायोमेट्रिक और आधार प्रमाणीकरण, अनिवार्य सामाजिक ऑडिट और साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासे शामिल हैं। इसका लक्ष्य वित्तीय वर्ष 2024-25 में हुए ₹193 करोड़ के फंड दुरुपयोग को रोकना है। हालांकि, इस डिजिटल ढांचे को "अनिवार्य" बनाने से बहिष्करण का खतरा भी है। "डिजिटल डिवाइड" के कारण, जिन श्रमिकों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं या जो खराब कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में रहते हैं, वे इस योजना से बाहर हो सकते हैं। यह एक दोधारी तलवार है: जहां तकनीक दक्षता ला सकती है, वहीं इसका अनिवार्य कार्यान्वयन सबसे कमजोर लोगों को अनजाने में काम से वंचित कर सकता है।



7. सिर्फ गड्ढे खोदना नहीं, 'विकसित भारत' के लिए संपत्ति निर्माण

यह बिल किए जाने वाले काम की प्रकृति में एक दार्शनिक बदलाव लाता है। मनरेगा के काम की पुरानी धारणा के विपरीत, नई योजना का दृष्टिकोण ग्रामीण श्रम को राष्ट्रीय पूंजी निर्माण में बदलने का है। अब ध्यान "विकसित भारत 2047" के दृष्टिकोण के अनुरूप टिकाऊ और समुदाय के स्वामित्व वाली संपत्ति बनाने पर है। काम को तीन प्रमुख "वर्टिकल्स" में केंद्रित किया गया है: जल सुरक्षा (बुनियादी ढांचा), ग्रामीण अवसंरचना (सड़क कनेक्टिविटी), और आजीविका अवसंरचना (भंडारण और विपणन)। इन परियोजनाओं को पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के साथ एकीकृत किया जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है जो योजना के उद्देश्य को केवल अल्पकालिक मजदूरी सहायता से दीर्घकालिक ग्रामीण उत्पादकता और श्रमिकों को केवल मजदूर के बजाय "हितधारक" (stakeholders) बनाने की ओर ले जाता है।

Sponsored Advertisement



8. बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी? सरकार का तर्क

सरकार का तर्क है कि लगभग दो दशकों से चल रहे मनरेगा में कई प्रणालीगत खामियां आ गई थीं। मुख्य कारण वित्तीय दुरुपयोग है; वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए ही ₹193 करोड़ की राशि का दुरुपयोग पाया गया, जहाँ नकली जॉब कार्ड बनाकर पैसा निकाला जा रहा था। दूसरा कारण रोजगार का कम उपयोग है; यह पाया गया कि केवल 7.6% परिवारों ने ही 100 दिनों का पूरा रोजगार प्राप्त किया। हालाँकि, इसका मुख्य कारण श्रमिकों की अनुपलब्धता नहीं, बल्कि सरकार द्वारा पर्याप्त परियोजनाओं को समय पर उपलब्ध कराने में प्रणालीगत विफलता थी। सरकार पारदर्शिता की कमी को दूर करने और जवाबदेही में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना चाहती है। इन्हीं चुनौतियों का समाधान करने के लिए वीबी-ग्राम जी बिल का प्रस्ताव रखा गया है।



9. मनरेगा बनाम वीबी-ग्राम जी: एक तुलनात्मक विश्लेषण

Sponsored Advertisement

मनरेगा एक 'अधिकार के एटीएम' की तरह था, जहाँ ग्रामीण अपनी ज़रूरत के हिसाब से काम 'निकाल' सकते थे। इसके विपरीत, वीबी-ग्राम जी एक 'सरकारी राशन की दुकान' की तरह है, जहाँ काम तभी तक उपलब्ध है जब तक बजट मौजूद है। मनरेगा में काम का अधिकार एक कानूनी गारंटी थी, जबकि वीबी-ग्राम जी में यह आवंटित धन की उपलब्धता पर निर्भर है। मनरेगा में केंद्र 100% अकुशल मजदूरी वहन करता था, जबकि नए बिल में राज्यों को 40% तक का हिस्सा देना होगा। पुराने मॉडल में कार्यों को अक्सर "गड्ढा खोदो और भरो" कहकर आलोचना की जाती थी, जबकि नया मॉडल पीएम गति शक्ति और विकसित भारत 2047 के साथ एकीकृत है। सबसे बड़ा भावनात्मक बदलाव महात्मा गांधी का नाम हटाना है, जिसे आलोचक योजना के मूल दर्शन को त्यागने के रूप में देख रहे हैं।



10. निष्कर्ष: ग्रामीण भारत का भविष्य और नीतिगत चुनौतियां

संक्षेप में, मनरेगा एक अधिकार-आधारित, मांग-संचालित सुरक्षा कवच था, वहीं नया VB-GRAM G बिल एक आपूर्ति-संचालित, राज्य-साझेदारी वाला ढांचा है। यह 'अधिकार-आधारित' सामाजिक सुरक्षा जाल से हटकर 'संपत्ति-निर्माण' और 'दक्षता' पर केंद्रित एक विकास मॉडल की ओर एक स्पष्ट कदम है। जहाँ मनरेगा का मुख्य उद्देश्य भूख और गरीबी से तत्काल राहत प्रदान करना था, वहीं नए बिल का लक्ष्य ग्रामीण बुनियादी ढांचे का निर्माण करके दीर्घकालिक समृद्धि लाना है। इस नए बिल की सफलता इसके कार्यान्वयन और सरकार की उस क्षमता पर निर्भर करेगी कि वह आलोचकों द्वारा उठाई गई गंभीर चिंताओं, जैसे कि राज्यों पर वित्तीय बोझ और काम के अधिकार के कमजोर होने, को कैसे संबोधित करती है। सवाल यह है कि क्या यह नया दृष्टिकोण ग्रामीण भारत को 'विकसित' बनाने में सफल होगा, या यह उस कानूनी सुरक्षा कवच को कमजोर कर देगा जिस पर करोड़ों लोग दो दशकों से निर्भर थे?

Sponsored Advertisement

समापन अपील

ग्रामीण भारत के इस सबसे बड़े बदलाव की जानकारी हर किसी तक पहुँचना जरूरी है। यदि आपको यह जानकारी महत्वपूर्ण लगी हो, तो कृपया इस ब्लॉग को लाइक करें और अपने मित्रों के साथ शेयर करें ताकि वे भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें।

ग्रामीण भारत के इस बड़े बदलाव के बारे में आपकी क्या राय है? क्या यह नई योजना गरीबों को आत्मनिर्भर बनाएगी या उनके अधिकारों को कमजोर करेगी? अपनी राय कमेंट में जरूर दें और इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें

Did you find this helpful?

Your support helps us create more free content. Please take a second to support us!

Comment
Share & Earn 0
Discussion (0)
Please Login to comment.